राज्य के स्वास्थ्य मंत्री यूटी खादर ने सोमवार को कहा कि कर्नाटक उन निजी अस्पतालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के लिए एक नए कानून पर विचार कर रहा है जो अवैतनिक चिकित्सा बिलों के कारण मृत मरीजों के शव रोकते हैं। प्रस्तावित कानून का उद्देश्य अस्पतालों को शव सौंपने के लिए भुगतान को एक शर्त बनाने से रोकना है।

खादर ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग प्रस्तावित परिवर्तनों को अंतिम रूप देने से पहले अस्पताल संघों से परामर्श करने की योजना बना रहा है। खादर ने कहा, “अगर किसी की निजी अस्पताल में मौत हो जाती है, तो शव लेने के लिए परिवार को पैसे देने पड़ते हैं। इससे पहले से ही संघर्ष कर रहे परिवारों पर आर्थिक बोझ पड़ता है और हो सकता है कि उनके पास पैसे न हों। अस्पतालों को बकाया वसूलने के लिए शव को रोकना नहीं चाहिए और परिवारों को परेशानी नहीं उठानी चाहिए।”
उन्होंने कहा कि सरकार ने 2007 और 2018 में पेश किए गए नियमों में कमियों की पहचान की है और मौजूदा ढांचे को बदलना चाहती है। उन्होंने कहा, “उन्हें ठीक से लागू नहीं किया गया है। मैं यह सुनिश्चित करना चाहता हूं कि वे पूरी तरह से लागू हों। यदि कोई निजी अस्पताल किसी शव को सौंपने से इनकार करता है, तो मरीज के रिश्तेदारों को क्या करना चाहिए और क्या कार्रवाई करनी चाहिए? हमें इसे संबोधित करने के लिए एक नए कानून की आवश्यकता है।”
कर्नाटक निजी चिकित्सा प्रतिष्ठान अधिनियम, 2007, 2018 में संशोधित, निजी चिकित्सा प्रतिष्ठानों को बकाया राशि के पूर्व भुगतान पर जोर दिए बिना मरीज के शरीर को तुरंत सौंपने की आवश्यकता है। अस्पताल कानूनी तरीकों से अवैतनिक राशि की वसूली कर सकते हैं।
खादर ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था ने परिवारों पर बिलों का निपटान करने का दबाव डाला क्योंकि वे अदालती कार्यवाही से बचना चाहते थे। उन्होंने कहा कि सरकार किसी रिश्तेदार के शव की रिहाई के लिए परिवारों को पैसे उधार लेने से रोकने के लिए बदलावों पर विचार कर रही है।
एक निजी अस्पताल संघ की अध्यक्ष शोभा प्रकाश ने कहा कि अगर अस्पतालों को गहन देखभाल इकाइयों में उपचार और दवाओं के लिए भुगतान प्राप्त किए बिना शव सौंपने की आवश्यकता होगी तो उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। प्रकाश ने कहा, “हम आईसीयू उपचार और दवाएं प्रदान करते हैं। यह मुश्किल होता है जब मरीज की मृत्यु के बाद हमें बिना भुगतान के शव सौंपने के लिए कहा जाता है। मंत्री का निर्णय सही है, लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत है। इस पर निजी अस्पतालों से परामर्श किया जाना चाहिए।”
खादर ने कहा कि अस्पताल संघों और अन्य हितधारकों के साथ परामर्श नए कानून बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा होगा।









