विशेष लेख धर्म एवं संस्कार–धन-दौलत से नहीं, प्रेम, विश्वास और संस्कारों से मजबूत बनता है परिवार; विजयादशमी पर बुराइयों को त्यागने का लें संकल्प

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सोने की लंका भी नहीं बचा सकी रावण को, भगवान श्रीराम के आदर्शों में छिपा है जीवन की सफलता का रहस्य

धन-दौलत से नहीं, प्रेम, विश्वास और संस्कारों से मजबूत बनता है परिवार; विजयादशमी पर बुराइयों को त्यागने का लें संकल्प

 

 

विशेष लेख धर्म एवं संस्कार

 

श्याम आर्य भीमपुर

 

यह लेख रामायण के पात्रों से मिलने वाली नैतिक शिक्षाओं पर आधारित है। भीमपुर विकासखंड के नादा, चल रही वर्षों से रामलीला में विशेष युवाओं बच्चों के लिए संदेश रहा विजयादशमी केवल रावण दहन का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपे अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और बुराइयों को समाप्त करने का संदेश भी देता है। भगवान श्रीराम का जीवन हमें सत्य, मर्यादा, त्याग और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है, वहीं रावण का चरित्र सिखाता है कि अपार ज्ञान, शक्ति और वैभव होने के बावजूद अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बन सकता है।

रावण के पास सोने की लंका, विशाल सेना, अपार धन-संपत्ति और अद्भुत विद्वता थी। इसके बावजूद वह अपनी गलतियों और अहंकार के कारण विनाश की ओर बढ़ा। विभीषण ने उसे सही मार्ग अपनाने की सलाह दी, लेकिन उसने उनकी बात नहीं मानी। दूसरी ओर, भगवान श्रीराम ने विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, मर्यादा और धर्म का साथ नहीं छोड़ा।

 

रामायण का संदेश है कि सच्ची ताकत केवल बाहुबल में नहीं, बल्कि अच्छे विचारों, सही निर्णयों और अपनों के प्रति सम्मान में होती है।

आज के समय में भी परिवारों में छोटी-छोटी बातों पर विवाद और मनमुटाव देखने को मिलते हैं। ऐसे में हमें भगवान श्रीराम के आदर्शों से सीखना चाहिए कि मतभेद होना गलत नहीं, लेकिन अहंकार के कारण रिश्तों को तोड़ देना उचित नहीं है। माता-पिता का सम्मान, बड़ों का आशीर्वाद, भाई-बहनों में प्रेम और बच्चों को अच्छे संस्कार देना ही परिवार की असली पूंजी है।

 

विजयादशमी पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि अहंकार के स्थान पर विनम्रता, नफरत के स्थान पर प्रेम और स्वार्थ के स्थान पर सेवा को अपनाएंगे।

याद रखिए, धन से मकान बनता है, लेकिन प्रेम से परिवार बनता है। शक्ति से युद्ध जीता जा सकता है, लेकिन विश्वास और एकता से जीवन की बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है।

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